आधुनिकता की अंधी दौड़ ने हमें पृकृति से दूर कर दिया है वर्तमान में ह्रदय रोगो की संभावना बहुत बढ़ गई है आइये जानते है इस का कारण और निवारण –

 ह्रदय रोगो का कारण

आज के व्यस्तता वाले समय में, आपकी दिनचर्या व ऋतुचर्या कुछ भी सही नहीं है ।आपके सोने का समय, जागने का समय, आपके खाने पीने का समय, कोई भी समय, ना तो उचित है और ना ही प्रकृति के अनुकूल । देर रात का खाना, सुबह देरी से जागना, ये सब कुछ भी प्रकृति के अनुरूप नहीं है । इसके अलावा आप जो खा रहे हैं, उस भोजन में जो चीजें आप खा रहे हैं वो क्या सही हैं ? और स्वास्थ्य के अनुकूल है। बहुत अधिक गरिष्ठ भोजन, मांसाहार का सेवन यह सभी आपके लिए बहुत ही खराब है। अधिक गरिष्ठ भोजन को पचाने के लिए आप कोई शारीरिक श्रम भी नहीं करते हैं। और शारीरिक श्रम के अभाव में यह भोजन आप के शरीर में फैट बढ़ाने का काम करता है। जिससे कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कारण रक्त में गाढ़ापन आ जाता है। इससे रक्त की शिराएं अवरुद्ध हो जाती हैं उनमें ब्लॉकेज आ जाते हैं। और इस कारण से हृदय रोग होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है।

निवारण व सफल चिकित्सा

हृदय रोग ना हो इसके लिए आपको आपके खाने पीने में, आपकी दिनचर्या और ऋतुचर्या में प्रकृति के अनुरूप परिवर्तन करने होंगे।

हमारे शरीर की रक्त वाहिनी नाडिया जो ह्रदय को रक्त पहुंचाने का काम करती हैं, अवरुद्ध हो जाती है। जिससे हर्टअटैक यानी हृदय घात होने की संभावना बढ़ जाती है। मॉर्डन चिकित्सा पद्धति में इसको ठीक करने के लिए बाईपास सर्जरी के द्वारा पैर या हाथ से नसों को निकालकर उनके स्थान पर नसों को लगाया जाता है या ब्लॉकेज को खोलने के लिए उनमें स्टंट डाला जाता है यह सर्जरी बहुत महंगी व कष्टपूर्ण और जोखिम भरी होती है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने अनुभव किया है कि यह इलाज नहीं है एक अस्थाई व्यवस्था है।

वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि अन्य कोई विधि खोजी जाये जिसके द्वारा यह अवरोध बिना किसी कष्टसाध्य सर्जरी के दूर हो सके इस विषय पर सेवानिवृत चिकित्सक डॉ. कोठारी ने एक नया अनुसन्धान किया जो सफल रहा। यह एक प्राकृतिक प्रयोग था।

 मैं उनका (डॉ. कोठारी) वही सफल प्राकृतिक चिकित्सा अनुभव आपको बता रहा हूं। यदि आप हृदय रोग से पीड़ित हैं, आपको हृदय की नसों में रुकावट की समस्या है, तो आप भी इस प्रयोग को किसी योग्य चिकित्सक की देख-रेख में अपना सकते है।

तो आइए जानते हैं हृदय रोग व नसों के ब्लॉकेज का वह प्राकृतिक, सरल व सफल चिकित्सा प्रयोग –

एक मरीज की तीनों रक्त -वाहानियां पूरी तरह लगभग अवरुद्ध हो गई थी । जो छोटी रक्त -वाहानियां है वे भी लगभग 70% अवरुद्ध हो गई, वह मरीज डॉ. कोठारी के पास बाईपास सर्जरी के लिए गया परंतु डॉ. कोठारी ने बताया कि आपको बाईपास सर्जरी नहीं करानी चाहिए । यह विकसित अमेरिका आदि में भीअसफल हो चुकी है और वहां के डॉक्टर बाईपास सर्जरी को अब मना करने लग गए हैं। इसके लिए वह अन्य विधि और दवाइयों से इन ब्लॉकेज को ठीक करने में लगे हुए हैं।

डॉ. कोठारी ने उस मरीज की चिकित्सा के लिए लौकी के रस का उपयोग किया । उन्होंने लौकी को छिलके सहित धोकर घियाकस  में कसकर , लौकी को मिक्सर ग्राइंडर में या सिलबट्टे पर पीस लें । लौकी को पीसने के समय, उसमें पुदीना के  6 पत्ते , तुलसी के 8 पत्ते , 4 कालीमिर्च का चूर्ण तथा 1 ग्राम पिसा हुआ सेंधा नमक डाल दें । पिसी हुई लौकी को पतले कपड़े से छानकर रस को निकाल ले । रस की मात्रा 125 से 150 ग्राम ही होनी चाहिए । रस के साथ बराबर का स्वच्छ पानी मिला ले।

भोजन के आधा पौन घंटे के बाद सुबह ,दोपहर और रात्रि में तीन बार लें ।  प्रारंभ में रस की मात्रा तीन-चार दिन तक कुछ कम भी ली जा सकती है । बाद में अभ्यास और पेट सुधर जाने पर रस की पूरी मात्रा लेनी चाहिए । हर बार ताजी दवा बनानी चाहिए।

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लौकी का रस पेट में जो भी पाचन विकार ( टोक्सिन ) होते हैं । उनको दूर करके, मल के द्वारा बाहर निकाल देता है। जिसके कारण शुरुआत में पेट में कुछ खलबली और गड़गड़ाहट आपको महसूस होती है। एकाद दस्त भी लग सकता है । यह स्वाभाविक प्रक्रिया है इससे आपको घबराना भयभीत नहीं होना चाहिए । पेट के विकार दूर होते ही सामान्य स्थिति हो जाएगी।

उस मरीज को यह रस पीने से आशातीत लाभ हुआ । यह चिकित्सा प्रारंभ करने से पहले तक, वह मरीज पलंग से उठ भी नहीं सकता था।  5 – 10 कदम चलने से सांस फूल जाती थी, वह हांफने लग जाता था । चिकित्सा के साथ डॉक्टर ने उसको पैदल चलने के लिए बताया और कहा कि यह आवश्यक है।

पहले दिन वह 15 कदम भी नहीं चल पाया, उसकी सांस पूरी तरह फूल गई परंतु उसने अभ्यास चालू रखा और कुछ दिनों के अभ्यास से वह, धीरे-धीरे 5 किलोमीटर टहलने लगा । आराम से सीढ़ी से ऊपर चढ़ने लगा, उसका दम फूलना बंद हो गया ।  डॉक्टर ने कहा कि अब टहलना 12 किलोमीटर तक बढ़ा दो । कहीं कोई तकलीफ , हृदय की धड़कन आदि नहीं हुई ।अब भोजन और कार्य व्यवहार सामान्य रूप से होने लगा । स्वास्थ्य भी बहुत सुधर गया । लौकी का रस सेवन करने से 10 दिन के पश्चात ही उसे लाभ मालूम होने लगा गया।

हृदय के रोगियों के लिए सुबह 10 से 12 किलोमीटर तक टहलना,  परिश्रम करना भी चिकित्सा का अंग है  इसलिए अपने चिकित्सक की सलाह से यह अवश्य करना चाहिए।

उपचार के दौरान खट्टे फल ,टमाटर ,नींबू ,मांस ,मदिरा, धूम्रपान आदि का हृदय रोगियों को पूरी तरह त्याग करना आवश्यक है। इसमें इस  बात का भी विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए की लौकी कडुवी स्वाद की नहीं हो,  क्योकि कडुवी लौकी का रस जहरीला होता है इससे फायदे के बजाय नुकसान हो जायेगा।

यद्यपि लौकी का रस बिल्कुल निर्दोष और स्वास्थ्यवर्धक है फिर भी इसका उपयोग अपने चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए।

यदि हृदय गड़बड़ करने लगे तो एक अन्य उपचार यह है की – एक चम्मच पान का रस,  एक चम्मच लहसुन का रस,  एक चम्मच अदरक का रस व एक चम्मच शहद  इन चारों को एक साथ मिला लें और धीरे-धीरे पिए,  इसमें पानी मिलाने की आवश्यकता नहीं है । इसे दिन में एक बार सुबह और एक बार शाम को पिए।

 हृदय में कोई और कठिनाई हो तो जो दवा लेते रहे हैं उसे भी लेते  रहे।

यह नुस्खा 21 दिन का है । आगे  चलकर इस दवा को यदि प्रतिदिन सवेरे एक समय लेते रहेंगे तो हृदय रोग कभी नहीं होगा यह हमारा अनुभव है।

दिल का दौरा,हृदय की नसों की ब्लॉकेज पर एक सफल प्रयोग A successful experiment on heart attack, blockage of heart veins बताया गया हैं, परंतु रोग के उपचार हेतु चिकित्सक से परामर्श करके ही इसका उपयोग करें।

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